विनोद कुमार झा
हिंदू धर्मग्रंथों में देवर्षि नारद को त्रिलोक संचारक, महान तपस्वी और भगवान विष्णु के परम भक्त के रूप में जाना जाता है। वे देवताओं और ऋषियों के बीच संवाद स्थापित करने वाले माने जाते हैं। लेकिन एक प्रसंग में, नारद जी ने स्वयं अपने प्रिय भगवान विष्णु को श्राप दे दिया था। यह कथा अत्यंत रोचक और शिक्षाप्रद है।
एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार देवर्षि नारद कठिन तपस्या में लीन थे। उनकी घोर तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हो गए। उन्हें लगा कि नारद जी यह तपस्या स्वर्ग पर अधिकार पाने के लिए कर रहे हैं। इसलिए इंद्र ने कामदेव को आदेश दिया कि वे नारद जी की तपस्या भंग करें।
कामदेव ने बसंत ऋतु को बुलाया, मधुर संगीत, सुगंधित पुष्प और सुंदर अप्सराओं की सहायता से नारद जी को विचलित करने का प्रयास किया। लेकिन नारद जी की तपस्या इतनी प्रबल थी कि वे इस छल को भांप गए और कामदेव को पराजित कर दिया।
कामदेव पर विजय पाने के बाद नारद जी को अपने तप की शक्ति पर अहंकार हो गया। वे भगवान विष्णु के पास गए और अपनी इस विजय गाथा का वर्णन किया। भगवान विष्णु मुस्कुराए लेकिन कुछ नहीं बोले। नारद जी को लगा कि उन्हें उचित प्रशंसा नहीं मिली।
भगवान विष्णु ने नारद जी के अहंकार को दूर करने के लिए एक लीला रची। उन्होंने अपने मायाजाल से एक सुंदर नगर का निर्माण किया और उसमें एक अत्यंत सुंदर राजकुमारी 'विश्वमोहिनी' को जन्म दिया। जब नारद जी उस नगर से गुजरे, तो राजकुमारी को देखकर उनके मन में विवाह की इच्छा जाग उठी।
नारद जी भगवान विष्णु के पास गए और उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें ‘हरि’ के समान सुंदर रूप प्रदान करें, जिससे राजकुमारी उन्हें अपना वर चुन ले। भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए नारद जी को ‘हरि’ रूप प्रदान कर दिया, लेकिन वह स्वरूप विष्णु का नहीं, बल्कि एक वानर (बंदर) का था।
नारद जी बड़े आत्मविश्वास के साथ स्वयंवर में गए। लेकिन जब राजकुमारी ने उन्हें देखा, तो वे चौंक गए क्योंकि नारद जी का चेहरा बंदर के समान हो गया था। राजकुमारी ने उन्हें अस्वीकार कर दिया और अन्य राजाओं के बीच से भगवान विष्णु को अपना वर चुन लिया।
इस अपमान से नारद जी अत्यंत क्रोधित हो गए। जब उन्होंने जल में अपना प्रतिबिंब देखा, तब उन्हें अहसास हुआ कि भगवान विष्णु ने उनके साथ लीला की है। क्रोध में आकर नारद जी ने भगवान विष्णु को श्राप दे दिया जो इस प्रकार है : –
1. जैसे मेरी पत्नी छिनी गई, वैसे ही तुम्हारी पत्नी भी तुमसे अलग हो जाएगी।
2. तुम भी मनुष्य रूप में जन्म लोगे और तुम्हें स्त्री वियोग का दुःख सहना पड़ेगा।
नारद जी के इस श्राप के कारण भगवान विष्णु को श्रीराम के रूप में अवतार लेना पड़ा और सीता माता के वियोग का दुःख सहना पड़ा। भगवान विष्णु ने नारद जी का अहंकार दूर करने के लिए यह लीला रची, जिससे नारद जी को यह समझ आया कि भक्ति और विनम्रता ही सबसे बड़ी शक्ति है। इस कथा के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि भगवान विष्णु अपने भक्तों को सही मार्ग पर लाने के लिए कई लीलाएं रचते हैं। नारद जी का यह श्राप भी भगवान की लीला का ही एक भाग था, जिससे उन्होंने पृथ्वी पर श्रीराम रूप में अवतार लेकर अपने भक्तों का उद्धार किया।
(जय श्रीराम)