मतदाता पहचान पत्र और आधार का संयोजन: पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम

विनोद कुमार झा

चुनाव आयोग द्वारा मतदाता पहचान पत्र (EPIC) को आधार से जोड़ने का निर्णय चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यह कदम फर्जी मतदाताओं की पहचान करने और चुनाव में दोहराव को रोकने में सहायक होगा।  चुनाव में फर्जी मतदान एक गंभीर समस्या रही है। कई बार एक ही व्यक्ति अलग-अलग जगहों पर नाम दर्ज करवा लेता है या नकली पहचान का उपयोग कर मतदान करता है। आधार से मतदाता पहचान पत्र को जोड़ने से ऐसे मामलों पर अंकुश लगेगा और मतदाता सूची अधिक विश्वसनीय बनेगी।  हालांकि, इस प्रक्रिया पर पहले भी सवाल उठ चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में इस योजना पर रोक लगाई थी, जब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में लाखों मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने की शिकायतें आई थीं। ऐसे में चुनाव आयोग को संवैधानिक प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए आगे बढ़ना होगा। आयोग ने यह स्पष्ट किया है कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है, बल्कि केवल पहचान का प्रमाण है। यह रुख कानूनी रूप से सही दिशा में उठाया गया कदम है।  

आयोग ने सभी राजनीतिक दलों और चुनाव अधिकारियों से सुझाव मांगे हैं, जिससे इस प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और समावेशी बनाया जा सके। यह स्वागत योग्य कदम है क्योंकि चुनाव सुधारों को प्रभावी बनाने के लिए राजनीतिक दलों और नागरिक समाज की भागीदारी अनिवार्य होती है।  हालांकि इस योजना में कई फायदे हैं, लेकिन कुछ चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। डेटा सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित करना एक बड़ी जिम्मेदारी होगी। चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी मतदाता अवैध रूप से मतदाता सूची से बाहर न हो और किसी की मतदान करने की संवैधानिक शक्ति प्रभावित न हो।  

अंततः, यह कदम चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने में मदद करेगा, बशर्ते इसे संवैधानिक दायरे में रहकर और जनता की सहमति से लागू किया जाए। यदि यह प्रक्रिया न्यायसंगत और पारदर्शी तरीके से पूरी होती है, तो यह भारतीय लोकतंत्र को और अधिक मजबूत बनाएगी।

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