विनोद कुमार झा
शाम का धुंधलापन धीरे-धीरे पसर रहा था। हल्की ठंडी हवा सरसों के खेतों में लहराती हुई, अमृता की गुलाबी साड़ी के पल्लू से खेल रही थी। वह छत पर खड़ी, सूरज को क्षितिज में समाते देख रही थी। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी बीते दिनों की कोई हल्की सी परछाईं, कोई भूली-बिसरी याद।"अमृता!" नीचे से उसकी माँ की आवाज़ आई।
"हाँ, माँ!" वह जल्दी से पल्लू संभालते हुए नीचे आई। माँ रसोई में चाय बना रही थीं।
"आज फिर छत पर खड़ी थी? क्या देखती रहती है वहाँ?" माँ ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा।
अमृता कुछ नहीं बोली, बस हल्का सा मुस्कुराई और चाय के कप उठाने लगी। पर माँ उसकी आँखों में छिपी हलचल को समझ रही थीं। अगले दिन शाम को फिर वही सिलसिला था। वह छत पर खड़ी थी, और हवा उसकी साड़ी के पल्लू से खेलने में मगन थी। तभी अचानक पीछे से एक आवाज़ आई "संभालो, कहीं उड़ न जाए!"
अमृता ने चौककर पीछे देखा। समीर था, गाँव के स्कूल में नया मास्टर। दुबला-पतला, मगर गहरी आँखों वाला लड़का। कुछ दिन पहले ही शहर से यहाँ आया था। अमृता ने झट से पल्लू ठीक किया और गुस्से से बोली, "आपको इससे क्या?"
समीर मुस्कुराया, "कुछ नहीं, बस हवा को आज़ाद चीज़ें पसंद हैं।" अमृता को उसकी बात समझ नहीं आई, या शायद समझकर भी अनसुना कर दिया। मगर उस दिन के बाद, जब भी वह छत पर आती, समीर कभी-कभी पास वाली गली से गुजरता, कभी दुकान पर खड़ा दिखता। उसकी आँखों में कुछ था, जो अमृता को महसूस होता, मगर वह खुद से भी उस एहसास को छुपाने की कोशिश करती।
दिन बीतते गए, और धीरे-धीरे अमृता को आदत होने लगी थी, उस नज़र की, उस मुस्कान की, उस हवा की जो पल्लू को सरका देती थी। एक दिन जब अमृता छत पर खड़ी थी, समीर ने नीचे से आवाज़ दी, "आज हवा बहुत तेज़ है!"
अमृता ने बिना देखे ही कहा, "तो?"
"तो... अगर पल्लू सरक जाए, तो संभाल लेना। हर बार कोई टोकने आए, ये ज़रूरी नहीं।" अमृता का चेहरा सुर्ख हो गया। उसने जल्दी से पल्लू कसकर थाम लिया और अंदर भाग गई। लेकिन उस दिन उसके दिल में कुछ और ही हलचल थी। शायद, एक नई कहानी शुरू हो रही थी... सरकते पल्लू की।
अमृता का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। कमरे में आकर वह खिड़की के पास खड़ी हो गई, लेकिन बाहर झाँकने की हिम्मत नहीं हुई। समीर की बातों में कोई हल्की-सी शरारत थी या कोई गहरी बात? वह समझ नहीं पा रही थी।
अगले दिन वह छत पर जाने से पहले सोच में पड़ गई। कहीं समीर फिर से दिख गया तो? कहीं कुछ कह दिया तो? लेकिन फिर उसे खुद पर गुस्सा आ गया—"मैं क्यों डर रही हूँ? मैंने कुछ गलत तो किया नहीं!" उसने खुद को समझाया और छत पर चली गई। लेकिन समीर उस दिन नहीं आया। न अगले दिन, न फिर उसके बाद। अमृता को अजीब-सा खालीपन महसूस होने लगा। क्या वह सच में उसकी राह देखने लगी थी? नहीं… नहीं, ऐसा नहीं हो सकता!
कुछ दिन बाद अमृता माँ के साथ बाजार गई थी। वहीं हलवाई की दुकान पर समीर दिखा। सफेद कुर्ते में, हल्की मुस्कान लिए, अपनी ही दुनिया में। वह उसे देखकर नहीं मुस्कुराया, न कोई इशारा किया। अमृता को अजीब-सा लगा। घर लौटते वक्त माँ ने हल्के-से कहा, "अच्छा लड़का है, पढ़ा-लिखा भी।"
अमृता चौंकी, "कौन?"
"समीर। गाँव वाले कहते हैं, ईमानदार है, नेकदिल है। लड़कियों की इज़्ज़त करना जानता है, तभी तो जब तू छत पर होती थी, कभी बदतमीज़ी नहीं की, बस… देखा और चला गया।"
अमृता का दिल जोर से धड़का। माँ कैसे समझ गईं? और क्या समीर सच में ऐसा था?
उस रात नींद नहीं आई। खिड़की से चाँदनी झाँक रही थी और हवा हल्की-सी ठंडी थी। पल्लू कंधे से सरककर गोद में आ गया। उसने उसे धीरे से पकड़ लिया, जैसे कोई अनकही बात पहली बार महसूस हो रही हो। कुछ दिन और बीते, गाँव में मेला लगा था। झूले, गाने, रंग-बिरंगे कपड़ों की चहल-पहल। अमृता सहेलियों के साथ घूम रही थी। तभी भीड़ में उसे समीर दिखा। वह अकेला था, किताबों से भरा झोला कंधे पर टांगे। उसकी नज़रें अमृता से मिलीं, फिर नीचे झुक गईं।
अमृता को अजीब लगा। यह वही समीर था जो कभी हल्की-सी छेड़छाड़ कर मुस्कुराता था? आज क्यों चुप था? वह आगे बढ़ी और हिम्मत करके धीरे से बोली, "आज हवा नहीं चल रही, फिर भी तुमने कुछ नहीं कहा?"
समीर ने चौंककर देखा, फिर हल्का मुस्कुराया। "हवा अब तुम्हारे जवाब की राह देख रही है…" अमृता का चेहरा गुलाबी पड़ गया। उसके पल्लू का कोना फिर से कंधे से सरक गया था… लेकिन इस बार, उसने उसे वापस नहीं संभाला। अमृता की साँसें तेज़ हो गईं। समीर की आखिरी बात उसके दिल की गहराइयों तक उतर गई थी "हवा अब तुम्हारे जवाब की राह देख रही है..."क्या यह इशारा था? क्या समीर अब फैसला उसी पर छोड़ चुका था?
वह बिना कुछ कहे सहेलियों के साथ आगे बढ़ गई, लेकिन मन वहीं अटका रहा। समीर की आँखों में जो इंतज़ार था, वो पहली बार इतना साफ़ महसूस हुआ। रात को वह अपनी खाट पर लेटी, छत की कड़ियों को घूर रही थी। नींद कोसों दूर थी। माँ-बाबूजी की पसंद का रिश्ता पिछले हफ्ते ही आया था शहर का एक लड़का, अच्छी नौकरी वाला। माँ को वह पसंद था, बाबूजी भी संतुष्ट थे। लेकिन अमृता का मन बेचैन था। उसने करवट बदली और खिड़की से झाँका। हल्की हवा चल रही थी, चाँदनी आँगन में बिखरी थी। अचानक उसे याद आया, समीर दो दिन बाद गाँव छोड़कर जा रहा है। गाँव के बच्चों की पढ़ाई के लिए उसने जितना कर सकता था, किया, लेकिन अब उसे अपने आगे की पढ़ाई के लिए वापस शहर जाना था।
दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। अगर मैंने कुछ नहीं कहा, तो शायद फिर कभी न कह पाऊँ..." अगले दिन शाम को वह छत पर थी, लेकिन इस बार उसकी नज़रें समीर को ढूँढ रही थीं। वो आया भी, लेकिन इस बार उसकी चाल धीमी थी, आँखों में वही गहराई, मगर कोई उम्मीद नहीं।
अमृता ने हिम्मत जुटाई और नीचे झाँककर धीरे से कहा"समीर!" वह रुका। शायद उसने ऐसी उम्मीद नहीं की थी। "हवा चल रही है…" अमृता ने मुस्कुराकर कहा। समीर ने एक पल उसे देखा, फिर हल्की मुस्कान के साथ कहा"हाँ, लेकिन अब शायद पल्लू संभालने की ज़रूरत नहीं है…" अमृता का चेहरा गुलाबी पड़ गया। उसने अपना पल्लू थोड़ा और सरका दिया, इस बार अनजाने में नहीं, बल्कि एक जवाब के रूप में।
दो दिन बाद, जब समीर ट्रेन पकड़ने जा रहा था, गाँव के स्टेशन पर भीड़ थी। समीर ने एक आखिरी बार चारों तरफ़ देखा, जैसे किसी को ढूँढ रहा हो। और तभी, उसने देखा, अमृता। वह थोड़ा पीछे खड़ी थी, माँ के साथ। उसका चेहरा शांत था, लेकिन उसकी आँखों में वही अनकहा जवाब था।
ट्रेन ने सीटी दी। समीर मुस्कुराया, हल्का-सा सिर झुकाया और ट्रेन में चढ़ गया। अमृता की माँ ने धीरे से पूछा, "क्या सोच रही है?"अमृता ने अपने पल्लू को धीरे-से कंधे पर ठीक किया और मुस्कुराते हुए कहा, बस, हवा का रुख देख रही हूँ।