आखिर प्राणी यम मार्ग से क्यों डरते हैं?

विनोद कुमार झा

धर्म ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार अति प्राचीनकाल में एक सुंदर नगर था जहां सोमदत्त नाम का सबसे धनी और प्रतिष्ठित व्यक्ति रहता था। उसके महल में हर समय ऐश्वर्य का वैभव झलकता था। रेशमी परदे, सोने-चांदी के आभूषण, सुगंधित धूप, और नृत्य-संगीत की मधुर ध्वनि उसके जीवन का अभिन्न अंग थे। किंतु इन सबके बीच वह एक चीज़ से कोसों दूर था भगवान की भक्ति। सांसारिक सुखों में डूबा वह यह भूल चुका था कि समय किसी के लिए नहीं ठहरता।

फिर एक दिन, जब उसके महल में उत्सव का माहौल था, भाग्य ने एक अकल्पनीय मोड़ लिया। मृत्यु का अघोषित संदेश आ चुका था। जैसे ही उसकी आत्मा शरीर से निकली, एक स्याह अंधकार से घिरी भयावह दुनिया उसके सामने प्रकट हुई। अचानक, भयंकर यमदूत उसके चारों ओर प्रकट हो गए, लाल जलती आंखें, रौद्र रूप, और लोहे की जंजीरें लिए वे उसकी ओर बढ़ने लगे। सोमदत्त की आत्मा भय से कांप उठी। उनके स्वर कठोर और रूप भयंकर था। वे लोहे की जंजीरों से बंधे पापियों को यमलोक की ओर घसीट रहे थे।

 सोमदत्त भयभीत हो गया और कांपते हुए बोला,"यह... यह क्या हो रहा है?" उसने घबराकर पूछा, लेकिन उत्तर में केवल गूंजती हुई कठोर हंसी सुनाई दी।अब वह अकेला था, सांसारिक वैभव पीछे छूट चुका था, और उसके सामने था केवल न्याय का कठोर निर्णय! मैं तो एक प्रतिष्ठित व्यक्ति था, मैंने किसी का बुरा नहीं किया, फिर मुझे ये भयंकर यमदूत क्यों लेने आए हैं?

यमदूतों में से एक ने कठोर स्वर में उत्तर दिया, तुमने भले ही किसी का बुरा न किया हो, किंतु भगवान का स्मरण भी नहीं किया। तुम्हें अपनी जिह्वा का प्रयोग करना था, परंतु तुमने कभी भगवान का नाम नहीं लिया। जब भक्ति का मार्ग इतना सरल था, तब भी तुमने उसे अपनाने का प्रयास नहीं किया। अब तुम्हें अपने कर्मों का फल भोगना होगा।"

यह कहकर यमदूतों ने उसे जंजीरों से जकड़ लिया और यमलोक की ओर ले चले। मार्ग अत्यंत भयंकर था—चारों ओर अंधकार, चीख-पुकार, कांटों से भरी पगडंडियाँ, जलते हुए अग्निकुंड और यातनाओं से कराहते पापी जीव। सोमदत्त ने घबराकर पूछा,"क्या अब भी कोई उपाय है जिससे मैं इस यातना से बच सकूं?"

यमदूत बोले,"अब पश्चात्ताप करने से कुछ नहीं होगा। जब तुम्हारे पास मनुष्य शरीर था, तब तुम्हें यह अवसर मिला था। जो लोग समय रहते भगवान की शरण में नहीं आते, उन्हें यममार्ग के भय का सामना करना ही पड़ता है।"

सोमदत्त की आत्मा पश्चात्ताप की अग्नि में जलने लगी, परंतु अब समय निकल चुका था। यमराज के दरबार में उसे उसके पापों का दंड सुनाया गया और उसे कठोर यातनाएँ भोगने के लिए नरक भेज दिया गया। मनुष्य को अपने जीवनकाल में ही भगवान की भक्ति करनी चाहिए। जिह्वा हमारे वश में है, भगवान का नाम लेना सरल है, फिर भी जो लोग इसे नहीं अपनाते, वे मृत्यु के बाद भयावह यममार्ग की यातनाएँ भोगते हैं। इसलिए, जब तक जीवन है, तब तक भगवद्भक्ति में मन लगाना ही सच्ची मुक्ति का मार्ग है।

धर्मपुराणों के अनुसार, मनुष्य के कर्मों के आधार पर उसकी मृत्यु होती है और उसके प्राण निकलने का स्थान भी निर्धारित होता है। अच्छे कर्म करने वाले व्यक्ति के प्राण आंख या मुख से निकलते हैं, जबकि बुरे कर्म करने वालों के प्राण शरीर के निचले भागों से निकलते हैं।

मृत्यु के पश्चात आत्मा को लेने यमदूत आते हैं, जिनका स्वरूप अत्यंत भयानक होता है। उनके हाथों में पाशदंड (फांसी का फंदा) होता है, जिससे वे जीवात्मा को बांधते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, पृथ्वी लोक से यमलोक की दूरी 99 हजार योजन बताई गई है।

मृत आत्मा को यमलोक ले जाने से पहले, एक बार उसे उसके घर वापस लाया जाता है। वहाँ वह अपने मृत शरीर और शोकाकुल परिजनों को देखती है। यह देखकर वह पुनः अपने शरीर में प्रवेश करना चाहती है, लेकिन यमराज उसे समझाकर उसके घर-परिवार से मोहभंग कर देते हैं और उसे आगे की यात्रा पर भेजते हैं।

कहा जाता है कि मृत्यु के बाद 12 दिन तक आत्मा घर पर ही रहती है और 13वें दिन यमदूत उसे यमलोक ले जाते हैं। इस यात्रा के दौरान पाप करने वालों को अत्यधिक कष्ट सहना पड़ता है। अंततः जीवात्मा यमराज के दरबार में पहुंचती है, जहां उसके कर्मों के अनुसार आगे का निर्णय लिया जाता है।


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