विनोद कुमार झा
क्या मृत्यु ही जीवन का अंत है, या यह एक नई यात्रा की शुरुआत है? यह प्रश्न न केवल धार्मिक ग्रंथों में गूंजता है, बल्कि अनगिनत आध्यात्मिक अनुभवों और दर्शनशास्त्र में भी अपना स्थान रखता है। हिन्दू धर्मग्रंथों में यह स्पष्ट किया गया है कि मृत्यु केवल एक परिवर्तन है, एक शरीर से दूसरे शरीर की यात्रा। ऋग्वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, गरुड़ पुराण और अन्य धर्मशास्त्रों में पुनर्जन्म की अवधारणा को विस्तार से समझाया गया है।
सनातन धर्म के अनुसार, "जीवात्मा न कभी जन्म लेती है, न ही मरती है, यह शाश्वत है" (भगवद्गीता 2.20)। यह आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करती है, अपने कर्मों के अनुसार नया जन्म प्राप्त करती है। लेकिन यह प्रक्रिया कैसे होती है? किस आधार पर जीवात्मा को नया जन्म मिलता है? और क्या आधुनिक विज्ञान भी पुनर्जन्म की अवधारणा को स्वीकार करता है? आइए, इस गूढ़ रहस्य को विस्तार से समझते हैं।
ऋग्वेद और यजुर्वेद जैसे प्राचीन ग्रंथों में यह उल्लेख मिलता है कि आत्मा अमर है और कर्मों के अनुसार इसे एक नया शरीर मिलता है। बृहदारण्यक उपनिषद (4.4.5) में कहा गया है: "जिसका आचरण शुभ होता है, वह उत्तम योनि में जन्म लेता है; और जिसका आचरण अशुभ होता है, वह निम्न योनि में जाता है।
भगवद्गीता पुनर्जन्म को अत्यधिक विस्तार से समझाती है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं: "जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर नया शरीर प्राप्त करती है।" (गीता 2.22)
इसका अर्थ है कि जन्म और मृत्यु केवल शरीर तक सीमित हैं, आत्मा सदा अमर है और कर्मों के अनुसार नई देह धारण करती है।
गरुड़ पुराण में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि मृत्यु के बाद आत्मा सूक्ष्म शरीर में यमलोक की यात्रा करती है, जहाँ इसके कर्मों का लेखा-जोखा किया जाता है। अच्छे कर्मों से स्वर्ग, और बुरे कर्मों से नरक अथवा पशुयोनि में जन्म मिलता है। सनातन धर्म में कर्म को सबसे महत्वपूर्ण तत्व माना गया है। पुनर्जन्म का आधार केवल आत्मा की यात्रा नहीं, बल्कि उसके संचित कर्म भी हैं।
पिछले जन्मों के कर्म जिनका फल इस जन्म में भोगना अनिवार्य है। वे कर्म जो कई जन्मों में संचित हुए हैं और भविष्य में फल देने वाले हैं। वर्तमान जीवन में किए जा रहे कर्म जो भविष्य के जन्मों को निर्धारित करेंगे।
शास्त्रों के अनुसार, आत्मा मृत्यु के समय जिन इच्छाओं से बंधी होती है, वे अगले जन्म के लिए मार्ग प्रशस्त करती हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु एक महान संगीतकार बनने की इच्छा के साथ होती है, तो संभावना है कि अगले जन्म में उसे संगीत से जुड़ा जीवन प्राप्त हो।
आधुनिक समय में भी पुनर्जन्म को लेकर कई शोध हुए हैं। डॉ. इयान स्टीवेन्सन जैसे वैज्ञानिकों ने हजारों मामलों का अध्ययन किया, जहाँ छोटे बच्चे अपने पिछले जन्म की स्मृतियों को स्पष्ट रूप से याद रखते थे। कई ऐसे मामले सामने आए जहाँ लोगों ने अपने पिछले जन्मों की घटनाओं, स्थानों और रिश्तों को सटीकता से पहचाना।
कुछ वैज्ञानिक इसे 'आत्मा की अमरता' का प्रमाण मानते हैं, तो कुछ इसे केवल अवचेतन मन का खेल कहते हैं। लेकिन हिन्दू धर्म में पुनर्जन्म केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन के चक्र का मूल आधार है।
हिन्दू धर्म में बताया गया है कि जब तक आत्मा कर्मों के बंधन में बंधी रहती है, तब तक वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं हो सकती। लेकिन इस चक्र से बाहर निकलने का मार्ग भी शास्त्रों में बताया गया है: अच्छे कर्मों और भक्ति से आत्मा उच्च लोकों में जाती है। आत्म-ज्ञान प्राप्त कर पुनर्जन्म के चक्र को तोड़ा जा सकता है। जब आत्मा पूर्ण ज्ञान और ध्यान के माध्यम से परमात्मा में विलीन हो जाती है, तब पुनर्जन्म की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
पुनर्जन्म की अवधारणा केवल धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्य सच्चाई है। हिन्दू धर्मग्रंथों में यह विस्तार से बताया गया है कि आत्मा कभी नष्ट नहीं होती, यह केवल शरीर बदलती है। कर्मों के आधार पर व्यक्ति को नया जन्म मिलता है और जब तक आत्मा मोक्ष प्राप्त नहीं करती, तब तक यह चक्र चलता रहता है।
चाहे इसे धार्मिक दृष्टि से देखा जाए या वैज्ञानिक शोधों से, पुनर्जन्म का रहस्य अभी भी अनगिनत प्रश्नों को जन्म देता है। क्या हम अपने पिछले जन्म की स्मृतियों को जाग्रत कर सकते हैं? क्या हम अपने कर्मों से इस चक्र से मुक्त हो सकते हैं? ये प्रश्न हमारे आध्यात्मिक और वैज्ञानिक अन्वेषण के लिए सदा प्रेरणा देते रहेंगे।