व्रत और दान से होती है मोक्ष की प्राप्ति...

विनोद कुमार झा


भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता और अन्य शास्त्रों में व्रत (उपवास) और दान के महत्व को विस्तार से समझाया है। उन्होंने यह बताया कि मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार फल भोगता है, लेकिन यदि वह सच्चे हृदय से व्रत और दान करता है, तो वह अपने पिछले पापों का प्रायश्चित कर सकता है और मोक्ष (मुक्ति) का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। व्रत आत्मसंयम का प्रतीक है, जबकि दान निःस्वार्थ सेवा और परोपकार का।

व्रत का तात्पर्य केवल भोजन त्यागना नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म से संयम रखना है। यह आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है जो आत्मा को शुद्ध करता है और व्यक्ति को भगवान की कृपा प्राप्त करने योग्य बनाता है।

भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार व्रत के लाभ: जो पाप अनजाने में किए गए हों, वे व्रत के प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं। व्रत से शरीर और मन की शुद्धि होती है, जिससे नकारात्मक प्रवृत्तियाँ समाप्त होती हैं। व्रत रखने से मन और इंद्रियों पर नियंत्रण बढ़ता है। ध्यान और भक्ति में मन अधिक केंद्रित रहता है। व्रत से मनुष्य में आत्मसंयम और सहनशक्ति बढ़ती है। जीवन में संतुलन और अनुशासन आता है।

भगवद्गीता में व्रत के बारे में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा:

"युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।" (भगवद्गीता 6.17)

अर्थात जो व्यक्ति संतुलित आहार, आचरण और कर्म करता है तथा अपनी इंद्रियों पर संयम रखता है, वह योग (मोक्ष) प्राप्त कर सकता है। व्रत के माध्यम से मनुष्य अपनी इच्छाओं पर काबू पाकर भगवान की भक्ति में लीन हो सकता है।

 दान का अर्थ केवल धन या वस्त्र दान करना नहीं, बल्कि निःस्वार्थ सेवा और परोपकार भी है। श्रीकृष्ण ने दान को तीन प्रकारों में विभाजित किया है जो इस प्रकार है : 

सात्त्विक दान: बिना किसी स्वार्थ या फल की इच्छा के किया गया दान। यह सबसे श्रेष्ठ दान है और मोक्ष की ओर ले जाता है।

राजसिक दान: जो मान-सम्मान, प्रसिद्धि या किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। यह मध्यम श्रेणी का दान है, जो पुण्य तो देता है लेकिन मोक्ष की ओर नहीं ले जाता।

तामसिक दान: अनिच्छा से, अपात्र व्यक्ति को, गलत उद्देश्य से किया गया दान। ययहदान पुण्य के बजाय पाप बढ़ा सकता है।

पापों से मुक्ति: दान से मनुष्य अपने कर्मों के बुरे प्रभाव को कम कर सकता है। यह पापों के प्रायश्चित का सबसे सरल माध्यम है।

सुख और शांति: निःस्वार्थ दान से मन को संतोष और आत्मिक सुख प्राप्त होता है।

मोक्ष की प्राप्ति: श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति श्रद्धा और प्रेमपूर्वक दान करता है, वह अपने कर्म बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

"दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।

देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।।" (भगवद्गीता 17.20)

अर्थात, जो दान किसी उपकार की आशा किए बिना उचित समय, स्थान और पात्र को दिया जाता है, वही सात्त्विक दान कहलाता है और यह मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बनता है।

 भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट कहा कि व्रत और दान का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति है। जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से दान करता है और संयमपूर्वक व्रत रखता है, वह धीरे-धीरे आत्मज्ञान प्राप्त करता है और संसार के मोह से मुक्त होकर भगवान की शरण में आ जाता है। केवल दिखावे के लिए व्रत और दान करने से लाभ नहीं होता।सच्ची श्रद्धा से किए गए कार्य ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

किसी भी कार्य को स्वार्थरहित भाव से करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि निःस्वार्थ कर्म ही सबसे श्रेष्ठ होता है। केवल व्रत और दान पर्याप्त नहीं हैं, साथ ही भगवान की भक्ति और सत्कर्म भी आवश्यक हैं।

"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।" (भगवद्गीता 18.66)

अर्थात, हे अर्जुन! सभी प्रकार के धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा और मोक्ष प्रदान करूँगा।

भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों के अनुसार, व्रत और दान न केवल धार्मिक कृत्य हैं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति के सशक्त साधन भी हैं। यदि मनुष्य सच्चे मन से व्रत रखे, संयम अपनाए और निःस्वार्थ भाव से दान करे, तो वह अपने पापों का प्रायश्चित कर सकता है और मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकता है। इसलिए, हमें श्रीकृष्ण की शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाना चाहिए और व्रत एवं दान के माध्यम से अपने जीवन को पवित्र बनाकर ईश्वर की कृपा प्राप्त करनी चाहिए।

भगवान श्रीकृष्ण ने व्रत और दान के साथ-साथ कई अन्य उपदेश भी दिए हैं, जो मानव जीवन को सही दिशा में ले जाने और मोक्ष प्राप्त करने में सहायक होते हैं। गीता में उन्होंने कर्म, भक्ति, ज्ञान और धर्म का मार्ग दिखाया है। ये सभी उपदेश व्रत और दान की महिमा को और अधिक स्पष्ट करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोग का सिद्धांत दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि मनुष्य को फल की चिंता किए बिना अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।" (भगवद्गीता 2.47)

अर्थात, तुम्हें केवल कर्म करने का अधिकार है, लेकिन उसके फल पर नहीं। इसलिए कर्म के फल की चिंता मत करो और न ही अकर्मण्यता को अपनाओ।

यह आत्मशुद्धि का मार्ग है, जो मोक्ष की ओर ले जाता है। इससे व्यक्ति अपने कर्तव्यों को पूरी निष्ठा से निभाता है। व्रत और दान का भी सच्चा अर्थ तभी सिद्ध होता है जब इन्हें निष्काम भाव से किया जाए। भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि व्रत और दान तभी पूर्ण होते हैं जब व्यक्ति प्रेम और श्रद्धा के साथ भगवान की भक्ति करता है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अनन्य भक्ति करता है, वही मोक्ष प्राप्त करता है।

"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।

तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।" (भगवद्गीता 9.26)

अर्थात, यदि कोई व्यक्ति प्रेम और श्रद्धा से मुझे एक पत्ता, फूल, फल या जल भी अर्पण करता है, तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ।व्रत और दान तभी सार्थक होते हैं जब वे भगवान की भक्ति के साथ किए जाएँ। अनन्य भक्ति से मनुष्य अपने सभी पापों से मुक्त हो सकता है। भक्ति के माध्यम से व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण पा सकता है और मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकता है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि मनुष्य को आत्मज्ञान प्राप्त करना चाहिए, जिससे वह अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सके और संसार के मोह से मुक्त हो सके।

"ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।

तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्।।" (भगवद्गीता 5.16)

अर्थात, जिनका अज्ञान ज्ञान से नष्ट हो जाता है, उनका ज्ञान सूर्य के समान सब कुछ प्रकाशित कर देता है। आत्मज्ञान से व्यक्ति सांसारिक मोह-माया से मुक्त हो सकता है। व्रत और दान का सच्चा उद्देश्य तभी पूरा होता है जब व्यक्ति आत्मज्ञान प्राप्त करता है। आत्मज्ञान से मनुष्य मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि संसार में तीन प्रकार के गुण होते हैं: सात्त्विक गुण (शुद्धता, ज्ञान, भक्ति), राजसिक गुण (इच्छा, क्रोध, अस्थिरता), तामसिक गुण (अज्ञान, आलस्य, हिंसा)।

"सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः।

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्।।" (भगवद्गीता 14.5)

अर्थात, सत्त्व, रजस और तमस – ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं और आत्मा को शरीर में बाँधते हैं। व्रत और दान का सर्वोत्तम परिणाम तभी मिलता है जब वे सात्त्विक प्रवृत्ति से किए जाएँ। सात्त्विक आचरण से मनुष्य भगवान की कृपा प्राप्त कर सकता है। सात्त्विक गुणों को अपनाने से मोक्ष का मार्ग खुलता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि आत्मा अमर है और केवल शरीर बदलता है। यदि व्यक्ति अच्छे कर्म करता है, व्रत और दान करता है, तथा ईश्वर की भक्ति करता है, तो वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो सकता है।

"न जायते म्रियते वा कदाचिन्नेयं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।" (भगवद्गीता 2.20)

अर्थात, आत्मा न कभी जन्म लेती है और न मरती है। यह नित्य, शाश्वत और अजर-अमर है। शरीर के नष्ट होने पर भी यह नष्ट नहीं होती।

मोक्ष प्राप्ति के लिए क्या करें?

व्रत और दान के साथ-साथ भगवान की शरण में जाएँ। निष्काम भाव से कर्म करें। मोह-माया का त्याग करें और सच्ची भक्ति करें। भगवान श्रीकृष्ण ने व्रत और दान को पापों के प्रायश्चित और मोक्ष प्राप्ति का महत्वपूर्ण साधन बताया है। व्रत से आत्मसंयम और आत्मशुद्धि मिलती है, जबकि दान से परोपकार और सेवा की भावना विकसित होती है। लेकिन केवल व्रत और दान पर्याप्त नहीं हैं, इन्हें निष्काम भाव से, सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ करना चाहिए। साथ ही, श्रीकृष्ण के अन्य उपदेश जैसे कर्मयोग, भक्ति योग, आत्मज्ञान, सात्त्विक गुणों को अपनाना और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होने की साधना भी आवश्यक है।

यदि कोई व्यक्ति भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षाओं का पालन करता है, सच्चे हृदय से व्रत और दान करता है, तथा भगवान की भक्ति में लीन रहता है, तो वह निश्चित ही अपने पापों का प्रायश्चित कर सकता है और मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

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