विनोद कुमार झा
महाकुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और राष्ट्रीय चेतना का भव्य प्रतिबिंब है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब लोकसभा में इसे देश की अगले एक हजार वर्षों की यात्रा का अहम पड़ाव बताया, तो यह सिर्फ एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं था, बल्कि भारत की गहरी सांस्कृतिक जड़ों और उसकी जीवंत परंपराओं का एक सजीव चित्रण भी था। महाकुंभ ने न केवल आध्यात्मिक उर्जा का संचार किया, बल्कि भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक सामर्थ्य को भी उजागर किया। यह आयोजन विश्व को भारत की क्षमता, सहिष्णुता और एकता का संदेश देता है। प्रयागराज में संपन्न इस महाकुंभ ने भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा के अद्भुत संगम को प्रस्तुत किया, जहां देश-विदेश के करोड़ों श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगाई।प्रधानमंत्री मोदी ने सही कहा कि इतिहास में कुछ ऐसे क्षण आते हैं, जो राष्ट्र को नई दिशा देने का काम करते हैं। स्वामी विवेकानंद का शिकागो भाषण, गांधीजी का दांडी मार्च और नेताजी सुभाषचंद्र बोस का ‘दिल्ली चलो’ आह्वान इसी श्रेणी में आते हैं। महाकुंभ भी एक ऐसा ही क्षण बन सकता है, जो भारत की सांस्कृतिक जागरूकता को और अधिक दृढ़ करेगा। यह आयोजन सबके प्रयासों से संभव हुआ। सरकार, प्रशासन, संत समाज और आम जनता—सभी की भागीदारी ने इसे एक अभूतपूर्व सफलता दिलाई। यह आयोजन दर्शाता है कि जब भारत अपनी परंपराओं और मूल्यों को आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करता है, तो दुनिया उसे आश्चर्य और सम्मान की दृष्टि से देखती है।
आज जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका को मजबूती से स्थापित कर रहा है, तब महाकुंभ जैसे आयोजन उसकी सांस्कृतिक पहचान को और अधिक सशक्त बनाते हैं। यह आयोजन केवल धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के आत्मबल, उसकी एकता और उसकी अटूट आस्था का उत्सव है। यह हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखने के साथ-साथ भविष्य की ओर आत्मविश्वास से बढ़ने की प्रेरणा देता है। महाकुंभ ने दुनिया को भारत के विराट स्वरूप का दर्शन कराया है। यह जागृत भारत का प्रतीक है, जो अपनी प्राचीन परंपराओं को आधुनिकता के साथ जोड़ते हुए एक नए युग की ओर अग्रसर है। यही भारत की असली शक्ति है, और यही इसकी अमरता का रहस्य भी।