कहानी: अपने बने पराये...

  विनोद कुमार झा

कहते हैं, जीवन में अपने और पराए की पहचान समय ही करवाता है। कभी-कभी जिन्हें हम अपना सबसे करीब समझते हैं, वही हमें सबसे गहरा घाव दे जाते हैं। यह कहानी भी ऐसे ही एक रिश्ते की है, जहाँ अपनों का बदलता व्यवहार दिल को चीर कर रख देता है।  

गाँव में रहने वाला एक सीधा-सादा व्यक्ति, रमेश, अपनी पत्नी सुनीता और दो बच्चों के साथ खुशहाल जीवन जी रहा था। रमेश मेहनती किसान था, और उसकी कमाई सीमित थी, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था। उसका छोटा भाई अजय पढ़ाई के लिए शहर चला गया था, जिसे रमेश ने अपने खून-पसीने की कमाई से पाला और पढ़ाया था। माँ-बाप के गुजर जाने के बाद रमेश ही अजय के लिए पिता समान बन गया था।  अजय पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बन गया और शहर में एक बड़ी कंपनी में नौकरी करने लगा। अब वह आलीशान बंगले में रहता था और उसकी बीवी रेशमा भी एक आधुनिक विचारों वाली महिला थी। जैसे-जैसे समय बीतता गया, अजय और उसके परिवार का व्यवहार बदलने लगा।  

एक दिन रमेश अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अजय के शहर वाले घर मिलने पहुँचा। उसने सोचा था कि छोटा भाई उसे देख कर बहुत खुश होगा, लेकिन अजय और उसकी पत्नी का ठंडा व्यवहार देखकर उसका दिल टूट गया।  

भैया, आप अचानक यहाँ कैसे?

अजय ने हैरानी से पूछा, मानो वह रमेश के आने से खुश नहीं था।  "बस, सोचा तुमसे और बच्चों से मिलने आ जाऊँ। बहुत दिन हो गए तुम्हें देखे हुए," रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा।  अच्छा किया, लेकिन भैया, यहाँ जगह थोड़ी कम है और ऑफिस का काम भी बहुत ज्यादा है। आप लोग होटल में ठहर जाते तो अच्छा रहता," अजय ने टालते हुए कहा।  रमेश को झटका लगा, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। पत्नी और बच्चे भी अजय के बदले हुए व्यवहार को देखकर दुखी थे। खाना खाने के दौरान भी रेशमा का बर्ताव रूखा था।  

"भैया, गाँव का क्या हाल है?" 

अजय ने औपचारिकता निभाने के लिए पूछा।  सब बढ़िया है, बस तुम्हारी याद आती है," रमेश ने कहा।  अजय ने मुस्कान दी, लेकिन वह बनावटी थी। कुछ समय बाद, जब रमेश ने आर्थिक तंगी का ज़िक्र किया और मदद की उम्मीद जताई, तो अजय ने साफ मना कर दिया।  भैया, अब मैं अपनी ज़िंदगी में बहुत व्यस्त हूँ। हर किसी की अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियाँ होती हैं, अजय ने बेरुखी से कहा।  

रमेश की आँखों में आँसू आ गए। जिस भाई को उसने माँ-बाप की तरह पाल-पोसकर बड़ा किया, आज वही उसे पराया कर रहा था। उसने बिना कुछ कहे उठकर जाने की तैयारी की।  जब रमेश गाँव वापस पहुँचा, तो उसके मन में एक ही सवाल था, क्या रिश्ते सिर्फ ज़रूरत तक सीमित होते हैं? क्या अपनों का प्यार भी समय के साथ बदल जाता है?  

उस दिन से रमेश ने अपने परिवार के साथ खुश रहने का फैसला कर लिया। उसने अब किसी से कोई उम्मीद नहीं रखी और अपनी मेहनत से अपनी दुनिया संवारने में लग गया।  रमेश ने ठान लिया कि अब वह अजय से किसी तरह की उम्मीद नहीं रखेगा। वह गाँव लौटकर अपने खेतों में और मेहनत करने लगा। सुनीता भी उसकी इस सोच में साथ थी। बच्चों को अच्छे से पढ़ाने के लिए उसने अपनी जमीन का एक टुकड़ा बेच दिया और उन्हें शहर के अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाया।  

समय बीतता गया। रमेश ने अपनी मेहनत और लगन से अपने खेतों में आधुनिक तकनीक अपनाई और धीरे-धीरे उसकी फसलें ज्यादा उपज देने लगीं। उसने अपने गाँव में एक नई पहचान बना ली। अब वह सिर्फ एक किसान नहीं, बल्कि गाँव के किसानों का मार्गदर्शक भी बन गया था। सरकारी योजनाओं की मदद से उसने अपने खेतों में सिंचाई की नई व्यवस्था की और दूसरों को भी सिखाने लगा कि कैसे कम लागत में ज्यादा उपज प्राप्त की जा सकती है।  

इधर, अजय की जिंदगी में तूफान आने वाला था। जिस कंपनी में वह काम करता था, वहाँ अचानक आर्थिक मंदी आ गई, और कई कर्मचारियों की नौकरियाँ चली गईं। अजय भी उनमें से एक था। नौकरी जाने के बाद उसकी लाइफस्टाइल बनाए रखना मुश्किल हो गया। रेशमा, जो हमेशा ऐशो-आराम की जिंदगी की आदी थी, इस बदलाव को सहन नहीं कर सकी। उसने अजय को ताने देने शुरू कर दिए और कुछ ही महीनों में मायके चली गई।  

अजय ने दूसरी नौकरी की बहुत कोशिश की, लेकिन अब उसके पास उतने पैसे नहीं थे कि वह अपने महंगे बंगले का खर्च चला सके। आखिरकार, उसे अपना बंगला बेचना पड़ा और छोटे किराए के घर में रहना पड़ा।  जब कोई रास्ता नहीं बचा, तो उसे अपने भाई रमेश की याद आई। वह गाँव जाने में हिचकिचा रहा था, लेकिन मजबूरी ने उसके कदम उसी घर की ओर मोड़ दिए, जिसे वह एक समय अपनाने में संकोच कर रहा था।  अजय जब गाँव पहुँचा, तो उसे यकीन नहीं हुआ कि उसका बड़ा भाई, जिसे उसने कभी साधारण किसान समझा था, आज गाँव का सम्मानित व्यक्ति बन चुका था। गाँव के लोग उसे इज्जत से "रमेश भैया" कहकर पुकारते थे।  

अजय जब घर पहुँचा, तो रमेश ने उसे देखकर आश्चर्य से पूछा, "अरे अजय, अचानक यहाँ कैसे आना हुआ?" 

अजय की आँखें भर आईं। उसे अपने पुराने शब्द याद आए, जब उसने रमेश को अपने घर में जगह देने से मना कर दिया था। आज वह खुद उसी भाई के घर मदद माँगने आया था।  भैया, मैं बहुत बड़ी मुसीबत में हूँ। नौकरी चली गई, घर भी नहीं बचा। रेशमा भी छोड़कर चली गई। अब समझ नहीं आ रहा कि क्या करूँ। अजय ने शर्म से सिर झुका लिया।  रमेश ने कोई ताना नहीं दिया, कोई कटाक्ष नहीं किया। उसने अपने छोटे भाई को गले से लगा लिया और कहा, "तूने चाहे मुझे पराया समझ लिया हो, लेकिन मैं तुझे हमेशा अपना छोटा भाई ही मानता रहा। जब तक मैं ज़िंदा हूँ, तुझे कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दूँगा।" 

अजय फूट-फूटकर रो पड़ा। उसे एहसास हुआ कि सच्चे अपने वे नहीं होते जो सुख में साथ खड़े होते हैं, बल्कि वे होते हैं जो दुःख में भी बिना शर्त अपनाते हैं।  अजय ने रमेश के साथ मिलकर खेती शुरू की। उसने महसूस किया कि जिंदगी में सिर्फ बड़ी नौकरी या महंगे बंगले ही सब कुछ नहीं होते, बल्कि परिवार का साथ सबसे बड़ा धन होता है।  

धीरे-धीरे अजय ने गाँव में रमेश के साथ एक नई जिंदगी शुरू की। वह आधुनिक तकनीकों की जानकारी लेकर खेती को और उन्नत बनाने में रमेश की मदद करने लगा। रमेश को अपने भाई पर गर्व महसूस हुआ।  समय के साथ अजय की सोच पूरी तरह बदल चुकी थी। अब वह शहर की चकाचौंध के बजाय अपने परिवार की सादगी और प्यार में खुश रहने लगा।  

अजय अब पूरी तरह से गाँव की जिंदगी में रम चुका था। उसने रमेश के साथ मिलकर खेती में कई सुधार किए, जिससे फसल की पैदावार पहले से ज्यादा होने लगी। गाँव में उसकी मेहनत को देखकर लोग भी उसकी इज्जत करने लगे। धीरे-धीरे अजय को अहसास हुआ कि सच्ची संतुष्टि सिर्फ बड़े शहरों में नहीं, बल्कि अपने परिवार और मेहनत में है।  इसी बीच, एक दिन शहर से रेशमा का फोन आया।  

"अजय, तुम कहाँ हो? मैंने सुना कि तुम गाँव में रह रहे हो?" 

अजय को उसकी आवाज सुनकर कोई खास एहसास नहीं हुआ। उसने ठंडे स्वर में जवाब दिया, "हाँ, अब यहीं हूँ। "रेशमा ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा, "मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ।"अजय उलझन में था। वह समझ नहीं पा रहा था कि उसे क्या करना चाहिए। रमेश ने उसकी ओर देखा और मुस्कुराते हुए कहा, "भाई, अपने फैसले खुद लेना सीखो। यह तुम्हारी जिंदगी है, इसे तुम्हें ही संवारना होगा।"  

अजय अगले ही दिन शहर गया और रेशमा से मिला। वह अब पहले जैसी नहीं दिख रही थी—चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं और आँखों में पछतावे का भाव।  "अजय, मैं जानती हूँ कि मैंने बहुत बड़ी गलती की। जब तुम मुसीबत में थे, तो मैंने तुम्हारा साथ नहीं दिया। लेकिन अब मैं समझ गई हूँ कि असली खुशी सिर्फ पैसे में नहीं होती। क्या तुम मुझे दूसरा मौका दोगे?" रेशमा ने हाथ जोड़कर कहा।  

अजय कुछ पल चुप रहा और फिर बोला, "रेशमा, जब मैं तुम्हारे पास था, तो तुम्हें मेरा महत्व नहीं पता था। जब मैंने अपने जीवन को दोबारा बनाया, तब तुम्हें एहसास हुआ। लेकिन मैं अब उस अजय से अलग हूँ। मैं अब गाँव में खुश हूँ, जहाँ मुझे सच्चा प्यार और सम्मान मिलता है। "रेशमा की आँखों से आँसू गिरने लगे, लेकिन अजय जानता था कि हर रिश्ता दूसरा मौका पाने लायक नहीं होता। उसने रेशमा को अलविदा कहा और गाँव लौट आया।  

अब रमेश और अजय की मेहनत रंग ला रही थी। गाँव के किसान उनसे सलाह लेने लगे। सरकार ने उनके गाँव को एक "आदर्श कृषि गाँव" के रूप में मान्यता दी, और कई किसान उनकी विधियों को सीखने आने लगे।  रमेश के दोनों बच्चे भी अब बड़े हो चुके थे। बड़ा बेटा, विकास, कृषि विज्ञान की पढ़ाई कर रहा था ताकि अपने पिता और चाचा की मदद कर सके, जबकि छोटी बेटी, पूजा, डॉक्टर बनने का सपना देख रही थी। 

 एक दिन गाँव में एक बड़ा कृषि सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें रमेश को सम्मानित किया गया। जब वह मंच पर पहुँचा, तो उसकी आँखें भावुक हो गईं। उसने माइक संभाला और कहा,  "मैंने जीवन में एक चीज़ सीखी है—कभी भी अपने अपनों को मत ठुकराओ। जब मैं कमजोर था, तब मुझे ठुकराया गया, लेकिन मैंने इसे अपनी ताकत बना लिया। आज मैं जो कुछ भी हूँ, वह सिर्फ अपनी मेहनत और अपने परिवार के प्यार की वजह से हूँ।"पूरा गाँव तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।  अजय ने भी इस सफर में बहुत कुछ सीखा। उसने जाना कि अपने कभी पराए नहीं होते, बस हालात कभी-कभी इंसान को अंधा कर देते हैं। लेकिन सच्चे रिश्ते कभी खत्म नहीं होते—बस उन्हें पहचानने की देर होती है।  

रिश्तों की असली परीक्षा मुश्किल समय में होती है। अपने वही होते हैं जो हर परिस्थिति में साथ खड़े रहें। अपनों को पराया समझने की गलती न करें, क्योंकि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। चाहे कितनी भी दूर चले जाएँ, अंत में लौटकर वहीं आते हैं जहाँ उन्हें सच्चा प्यार और अपनापन मिलता है।


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