विनोद कुमार झा
श्रीरामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण में भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र, उनकी करुणा, न्यायप्रियता और अपने सेवकों के प्रति अटूट स्नेह की कई कथाएँ मिलती हैं। जब भगवान श्रीराम को माता कैकेयी के वरदान स्वरूप 14 वर्षों के वनवास पर जाना पड़ा, तब उन्होंने केवल अपने परिवार और राज्य की चिंता नहीं की, बल्कि अपने सेवकों के भविष्य की भी सोचकर एक महत्वपूर्ण आदेश दिया। यह कथा उसी क्षण से जुड़ी है जब वे अपने सेवकों से विदा ले रहे थे।जब राजा दशरथ ने माता कैकेयी के वरदान को पूरा करने के लिए श्रीराम को वनवास जाने का आदेश दिया, तो यह समाचार पूरे अयोध्या में शोक और दुख का कारण बन गया। केवल प्रजा ही नहीं, बल्कि श्रीराम के निकटस्थ सेवक भी व्यथित हो उठे। वे श्रीराम के साथ वन जाने की इच्छा प्रकट करने लगे, लेकिन श्रीराम ने उन्हें रोक दिया।
श्रीराम जानते थे कि उनके वन जाने के बाद सेवकों का जीवन कठिन हो सकता है। वे अपनी जीविका और सुरक्षा को लेकर चिंतित थे। इसी कारण, उन्होंने अपने सभी सेवकों को अपने पास बुलाया और उन्हें ढांढस बंधाते हुए कहा, तुम सबको चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। मैं अपने वनवास के समय तुम्हें असहाय नहीं छोड़ सकता। मैं तुम्हारी जीविका के लिए पर्याप्त धन का प्रबंध कर रहा हूँ। किंतु मेरी एक विनती है कि जब तक मैं और लक्ष्मण वन से लौटकर ना आएँ, तुम लोग इस घर को कभी सूना मत छोड़ना और इसे छोड़कर कहीं और मत जाना।
श्रीराम के इन वचनों को सुनकर सेवकों की आँखों में आँसू आ गए। वे अपने प्रभु से अलग होने की कल्पना मात्र से ही दुखी हो गए। उन्होंने कहा, "प्रभु! हमारे लिए धन से अधिक महत्वपूर्ण आपकी सेवा है। यदि आप हमें छोड़कर चले गए, तो हमारा जीवन व्यर्थ हो जाएगा। कृपा कर हमें भी अपने साथ वन में ले चलें।"
किन्तु पभु श्रीराम ने मुस्कुराते हुए कहा ,"तुम्हारा स्थान यहीं है। यह अयोध्या मेरा घर ही नहीं, बल्कि तुम सबका भी आश्रय है। इस घर को सूना छोड़ देने से यह वीरान हो जाएगा, और मेरी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। अतः, यह तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम इसे जीवंत और सुरक्षित बनाए रखो।"
इसके बाद, श्रीराम ने अपने हाथों से सभी सेवकों को धन और वस्त्र वितरित किए ताकि वे 14 वर्षों तक बिना किसी चिंता के रह सकें। जब श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वन को प्रस्थान कर गए, तब भी सेवकों ने उनके आदेश का पालन किया। वे हर दिन श्रीराम के महल की सफाई करते, दीप जलाते, और ऐसा प्रतीत होता मानो वे अभी भी वहाँ उपस्थित हों।
वे यह भी प्रार्थना करते कि 14 वर्ष शीघ्र समाप्त हों और उनके प्रिय स्वामी पुनः अयोध्या लौटें। उनके प्रेम और समर्पण का यह दृश्य अयोध्या के प्रत्येक नागरिक के लिए प्रेरणादायक बन गया। जब श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वन के लिए प्रस्थान कर गए, तब अयोध्या के सभी लोगों में गहरा शोक व्याप्त हो गया। महाराज दशरथ तो अपने प्रिय पुत्र के वियोग में जीवित भी न रह सके, लेकिन श्रीराम के सेवकों ने उनके आदेश को अपनी तपस्या मान लिया।
सेवकों की निष्ठा: श्रीराम के महल में रहने वाले सेवक उनकी अनुपस्थिति में भी अपने कार्यों को वैसे ही करते रहे, मानो उनके स्वामी वहीं उपस्थित हों।
महल की देखभाल: सेवक प्रतिदिन श्रीराम के महल की सफाई करते, दीप जलाते और उनके आसन को ठीक उसी प्रकार सुसज्जित रखते जैसे कि वे कभी भी लौट सकते हों।
नियमित पूजा-अर्चना: सेवक भगवान की मूर्तियों के सामने राम के शीघ्र लौटने की प्रार्थना करते और उनकी अखंड उपस्थिति की भावना बनाए रखते।
अयोध्या के नागरिकों को सांत्वना: सेवक न केवल स्वयं श्रीराम की अनुपस्थिति को सहते रहे, बल्कि उन्होंने नगरवासियों को भी ढांढस बंधाया कि उनके स्वामी एक दिन लौटकर अवश्य आएंगे।
समय बीतता गया, लेकिन सेवकों की निष्ठा में कोई कमी नहीं आई। उनके लिए यह केवल एक कर्तव्य नहीं, बल्कि भक्ति का प्रतीक बन गया था। उन्होंने स्वयं को श्रीराम के घर की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया।
- किसी ने महल छोड़ने का विचार तक नहीं किया।
- किसी ने दूसरे स्थान पर बसने की सोची भी नहीं।
- उन्होंने अपने स्वामी के आदेश को हृदय से स्वीकार किया और उनकी अनुपस्थिति में भी उन्हें महसूस करते रहे।
इस बीच, कई बार परिस्थितियाँ ऐसी आईं जब सेवकों को महल छोड़ने के लिए विवश करने की कोशिशें की गईं, लेकिन वे अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहे।
14 वर्षों के वनवास के बाद जब श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटे, तब समस्त नगर आनंद से झूम उठा। लेकिन सबसे अधिक प्रसन्नता उनके उन सेवकों को हुई, जिन्होंने अपने स्वामी के महल को कभी सूना नहीं छोड़ा।
श्रीराम जब अपने महल में पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि सब कुछ वैसा ही था जैसा वे छोड़कर गए थे। दीप जल रहे थे, आसन व्यवस्थित था, और सेवक अपनी उसी निष्ठा से खड़े थे। यह देख श्रीराम भावुक हो गए।
प्रभु श्रीराम ने कहा, तुम सबने केवल मेरे घर की रक्षा नहीं की, बल्कि मेरी आत्मा की रक्षा की है। तुम्हारी निष्ठा ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची सेवा केवल तन से नहीं, बल्कि मन और आत्मा से की जाती है। मैं तुम सबका ऋणी हूँ।
सेवकों की आंखों में आनंद और भक्ति के अश्रु छलक पड़े। वे जानते थे कि उनकी तपस्या सफल हुई और उनके आराध्य स्वामी पुनः उनके समक्ष थे।
1. निष्ठा और समर्पण: सच्ची सेवा तब ही सिद्ध होती है जब कठिनाईयों के बावजूद कोई अपने कर्तव्य से विमुख न हो।
2. आदेश का सम्मान: यदि गुरु या स्वामी कोई आदेश दें, तो उसे केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि भक्ति मानकर निभाना चाहिए।
3. सच्चे सेवक की पहचान: जो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी अपने स्वामी के प्रति अटूट विश्वास और समर्पण बनाए रखता है, वही सच्चा सेवक कहलाता है।
प्रभु श्रीराम का यह आदेश केवल एक साधारण अनुरोध नहीं था, बल्कि यह उनकी अयोध्या के प्रति अटूट प्रेम और अपने लोगों के प्रति उनकी जिम्मेदारी का प्रतीक था। उनके सेवकों का समर्पण यह दर्शाता है कि जब प्रेम और भक्ति अटूट होती है, तब सेवा भी संपूर्ण हो जाती है।
"जय श्रीराम!"