विनोद कुमार झा
मृत्यु एक ऐसा रहस्य है, जो हर प्राणी के जीवन का अनिवार्य सत्य है। हम चाहे इसे स्वीकार करें या न करें, यह जीवन का अपरिहार्य अंग है। लेकिन क्या मृत्यु हमेशा हमारे साथ चलता है? यह प्रश्न गहराई से सोचने पर मजबूर कर देता है।
यदि हम मृत्यु को केवल जीवन के अंत के रूप में देखते हैं, तो यह प्रतीत होता है कि यह किसी विशेष क्षण में आता है। लेकिन अगर हम इसे व्यापक दृष्टिकोण से देखें, तो यह हमारे साथ हर पल चलता रहता है। शरीर की कोशिकाएं हर दिन मरती हैं और नई जन्म लेती हैं। विचार पुराने होते हैं, भावनाएं बदलती हैं, और परिस्थितियां नष्ट होती जाती हैं। इन सबका अंत भी एक प्रकार की मृत्यु ही है। जीवन और मृत्यु एक-दूसरे के पूरक हैं। जैसे दिन और रात, सुख और दुःख साथ चलते हैं, वैसे ही जीवन के साथ मृत्यु भी है। हर क्षण, हर परिवर्तन के साथ मृत्यु हमारे करीब आती है।
मृत्यु न तो बनावटी है और न ही केवल एक विचार। यह एक अटल सत्य है। संसार में जो कुछ भी जन्म लेता है, उसकी समाप्ति निश्चित है। मृत्यु से बचा नहीं जा सकता, इसे केवल टाला जा सकता है। धर्म, दर्शन और विज्ञान भी इसे स्वीकार करते हैं कि यह जीवन का अंतिम चरण है।
प्राणी मरने के बाद सबसे पहले कहां जाता है?
यह प्रश्न धार्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अलग-अलग उत्तर रखता है।
1. वैज्ञानिक दृष्टिकोण: विज्ञान के अनुसार, जब कोई प्राणी मरता है, तो उसकी शारीरिक क्रियाएं बंद हो जाती हैं, और शरीर धीरे-धीरे सड़ने लगता है। मृत्यु के तुरंत बाद मस्तिष्क की गतिविधि कुछ समय तक बनी रहती है, लेकिन कुछ ही क्षणों में सब कुछ समाप्त हो जाता है।
2. धार्मिक दृष्टिकोण: हिंदू धर्म के अनुसार, आत्मा शरीर छोड़कर अपने कर्मों के अनुसार अगले गंतव्य की ओर बढ़ती है। इसे यमराज के दूत ले जाते हैं, जहां प्राणी के अच्छे और बुरे कर्मों का लेखा-जोखा होता है। इसके बाद आत्मा को पुनर्जन्म या मोक्ष प्राप्त होता है।
बौद्ध धर्म: आत्मा किसी नए शरीर में पुनर्जन्म लेती है, जब तक कि वह निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त नहीं कर लेती।
इस्लाम और ईसाई धर्म: आत्मा को न्याय के लिए बुलाया जाता है और उसे जन्नत (स्वर्ग) या जहन्नम (नरक) में भेजा जाता है। कुछ परंपराओं में मृत्यु के बाद आत्मा किसी नए रूप में जन्म लेती है या ब्रह्मांड में विलीन हो जाती है।
3. आध्यात्मिक दृष्टिकोण: कई दार्शनिक मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु केवल एक परिवर्तन है। आत्मा अजर-अमर होती है और यह किसी नए शरीर में जन्म लेने के लिए यात्रा पर निकल पड़ती है। कुछ परंपराओं में मृत्यु को एक विश्राम के रूप में भी देखा जाता है, जिसके बाद आत्मा नए अनुभवों की ओर बढ़ती है।
प्राणी को मृत्यु का भय स्वाभाविक है, क्योंकि हम अनिश्चितता से डरते हैं। लेकिन यदि हम इसे एक नए परिवर्तन के रूप में देखें, तो यह डर कम हो सकता है। यह एक सत्य है, जिसे कोई टाल नहीं सकता। यह हर क्षण हमारे जीवन का हिस्सा बनी रहती है। मृत्यु का डर तभी समाप्त होता है, जब हम इसे जीवन का स्वाभाविक अंग मानकर इसे स्वीकार कर लेते हैं। इसलिए, मृत्यु से डरने के बजाय, जीवन को पूरी ऊर्जा और प्रेम से जीना ही सबसे सही मार्ग है।
मृत्यु न केवल जीवन का अंत है, बल्कि यह एक नया आरंभ भी हो सकती है। यह एक परिवर्तन है, एक चक्र है, जो हर क्षण जारी रहता है। मृत्यु केवल शरीर के नष्ट होने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता का एक महत्वपूर्ण भाग है। यह हर प्राणी के साथ अनिवार्य रूप से चलता है—कभी सूक्ष्म रूप में, तो कभी स्थूल रूप में। इसे नकारना संभव नहीं, लेकिन इसे स्वीकार करके हम जीवन को अधिक गहराई से समझ सकते हैं। मृत्यु का भय केवल अज्ञानता का परिणाम है, और इसे समझकर हम इसे सहजता से स्वीकार कर सकते हैं। इसलिए, मृत्यु को केवल अंत मानने के बजाय, इसे एक नया परिवर्तन मानकर जीवन को पूरी ऊर्जा और प्रेम से जीना ही सबसे सही मार्ग है।