संविधान और आरक्षण पर राजनीतिक घमासान


भारतीय राजनीति में आरक्षण और संविधान से जुड़ी बहसें समय-समय पर उफान मारती रही हैं। हाल ही में संसद में भाजपा और कांग्रेस के बीच इस मुद्दे पर हुई तीखी नोकझोंक ने एक बार फिर से इसे सुर्खियों में ला दिया है। भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने कर्नाटक की कांग्रेस सरकार द्वारा सार्वजनिक ठेकों में मुस्लिम समुदाय को चार प्रतिशत आरक्षण देने की नीति पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि राज्य के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने जरूरत पड़ने पर संविधान बदलने की बात कही है। इस पर कांग्रेस ने तुरंत पलटवार किया और भाजपा को झूठ फैलाने का दोषी ठहराया।

 सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या किसी राज्य सरकार या पार्टी के नेता को संविधान बदलने की बात कहनी चाहिए? भारतीय संविधान, जिसे बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में निर्मित किया गया, देश की अखंडता और विविधता को बनाए रखने के लिए एक सुदृढ़ आधारशिला है। इसमें संशोधन की प्रक्रिया तो निश्चित रूप से लोकतांत्रिक ढांचे के तहत संभव है, लेकिन क्या यह किसी एक राजनीतिक दल के एजेंडे पर निर्भर हो सकता है? भाजपा ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और कहा कि कांग्रेस संविधान को बदलना चाहती है। वहीं, कांग्रेस ने इसे बेबुनियाद आरोप बताते हुए भाजपा को संविधान विरोधी बताया।

भारत में आरक्षण व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित और पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाना है। संविधान में यह स्पष्ट किया गया है कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। ऐसे में कर्नाटक सरकार द्वारा मुस्लिम समुदाय को चार प्रतिशत आरक्षण देने की नीति संवैधानिक दृष्टि से कितनी सही है, इस पर कानूनी विशेषज्ञों और न्यायपालिका का मत महत्वपूर्ण होगा। भाजपा इसे मुस्लिम तुष्टीकरण का मामला बता रही है, जबकि कांग्रेस इसे सामाजिक न्याय से जोड़ रही है।  संसद में जिस तरह से इस मुद्दे पर हंगामा हुआ, उससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों दल इसे राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। रिजिजू और नड्डा ने कांग्रेस पर निशाना साधा, तो वहीं खरगे और जयराम रमेश ने भाजपा पर झूठ फैलाने और भ्रामक बयान देने का आरोप लगाया। सवाल यह उठता है कि क्या यह बहस सिर्फ राजनीतिक अंकगणित तक सीमित रहेगी या फिर इसमें कोई ठोस नीतिगत चर्चा भी होगी?

यह जरूरी है कि संविधान और आरक्षण जैसे गंभीर मुद्दों पर राजनीति से ऊपर उठकर चर्चा हो। अगर किसी राज्य सरकार की आरक्षण नीति संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध जाती है, तो इसकी समीक्षा न्यायिक प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए, न कि केवल राजनीतिक मंचों पर। इसके अलावा, विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों को यह समझना चाहिए कि संसद महज हंगामा करने का स्थान नहीं है, बल्कि देश की नीतियों पर सार्थक चर्चा करने का मंच है। संविधान बदलने या न बदलने की बहस में उलझने की बजाय, सरकारों को यह देखना चाहिए कि आरक्षण जैसी व्यवस्थाएं जरूरतमंदों तक सही तरीके से पहुंच रही हैं या नहीं।संविधान भारत की आत्मा है, और इसे किसी भी राजनीतिक दल के संकीर्ण स्वार्थों का शिकार नहीं बनने देना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि हम संविधान की रक्षा करें और उसे राजनीति का हथियार न बनने दें।

जय हिन्द

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