मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा

विनोद कुमार झा

भारत में गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि जन-जन की आस्था का केंद्र है। गंगा जी का महत्व बताने की आवश्यकता नहीं है। प्राचीन धर्मग्रंथों में माता गंगा की महिमा का वर्णन मिलता है। ऋग्वेद के  दशवें मंडल के 75वें सूक्त में गंगा का पहला उल्लेख किया गया है, जिसे नदीस्तुति सूक्त कहा जाता है। इसमें अन्य नौ नदियों के साथ गंगा जी का भी उल्लेख मिलता है।  इसकी महिमा का वर्णन वैदिक ग्रंथों, पुराणों और महाकाव्यों में मिलता है। गंगा को पवित्र, मोक्षदायिनी और जीवनदायिनी माना गया है। ऋग्वेद में गंगा का प्रथम उल्लेख मिलता है, वहीं वाल्मीकि रामायण और महाभारत में इसके उद्गम और पृथ्वी पर अवतरण की कथा विस्तार से वर्णित है।  

इस सूक्त में कहा गया है:  "हे गंगा, यमुना, सरस्वती, शुतुद्रि, परुष्णी, असिकिनी, मरुवृद्धा, वितस्ता, अर्जीकिया तथा सुषोमा, मेरा नमस्कार स्वीकार करो।"  

गंगा की उत्पत्ति की विभिन्न कथाएँ हमारे धार्मिक ग्रंथों में मिलती हैं। ऋग्वेद में इसे अन्य नदियों के साथ वर्णित किया गया है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, हिमालय की दो पुत्रियों में से गंगा ज्येष्ठ थीं, जिन्हें देवताओं ने स्वर्ग में ले जाकर त्रिपथगा (तीनों लोकों में प्रवाहित होने वाली) बना दिया। महाभारत में उल्लेख है कि गंगा विष्णु के चरणों से प्रकट हुईं और ब्रह्मा के कमंडल में रहीं, फिर भगीरथ की तपस्या के कारण शिवजी की जटाओं से पृथ्वी पर अवतरित हुईं।  वाल्मीकि रामायण (बालकांड, 35वें सर्ग) में गंगा की उत्पत्ति की कथा आती है। इसके अनुसार, हिमालय और उनकी पत्नी मैनावती की दो पुत्रियां थीं—गंगा और उमा (पार्वती)। देवताओं के अनुरोध पर हिमालय ने गंगा को स्वर्ग भेज दिया, जहाँ वे त्रिपथगा (तीनों लोकों में प्रवाहित) कहलाईं।  

जब महादेव और माता पार्वती का विवाह हुआ, तब महादेव ने अपना तेज पृथ्वी पर छोड़ दिया, जिससे कार्तिकेय का जन्म हुआ। इसी बीच अयोध्या के राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया, लेकिन इंद्र ने यज्ञ का अश्व चुरा लिया और कपिल मुनि के आश्रम में छोड़ दिया। सगर के 60,000 पुत्रों ने कपिल मुनि पर आरोप लगाया, जिससे क्रोधित होकर उन्होंने उन्हें भस्म कर दिया।  राजा सगर के पौत्र अंशुमान और फिर उनके पुत्र दिलीप गंगा को पृथ्वी पर लाने में असफल रहे। अंततः भगीरथ ने कठिन तपस्या की, जिससे ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और गंगा को पृथ्वी पर भेजने के लिए राजी हुए। परंतु गंगा के वेग को रोकने के लिए भगवान  शंकर ने अपनी जटाओं में उन्हें धारण किया और फिर बिंदुसरोवर से मुक्त किया।

 गंगा जब पृथ्वी पर आईं, तो वे राजर्षि जह्नु के आश्रम से होकर गुज़रीं और उनके यज्ञ को जलमग्न कर दिया। इससे क्रोधित होकर जह्नु ऋषि ने गंगा को पी लिया, लेकिन बाद में उनकी प्रार्थना से उन्होंने उन्हें अपने कान से बाहर निकाला, जिससे गंगा का एक नाम जाह्नवी पड़ा।  महाभारत (आदि पर्व, वन पर्व, सभा पर्व) में गंगा का उल्लेख मिलता है। राजा महाभिष को ब्रह्मा जी ने गंगा के साथ पृथ्वीलोक में जन्म लेने का श्राप दिया। गंगा ने महाराज प्रतीप के पुत्र शांतनु से विवाह किया और उनकी आठ संतानें हुईं, जिनमें से सात को गंगा ने मोक्ष दिला दिया, लेकिन आठवां पुत्र भीष्म बने।  

वामन पुराण के अनुसार, जब भगवान वामन के चरण ब्रह्मांड कपाल से टकराए, तो वहाँ से गंगा प्रवाहित हुईं, जिसे ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल में भर लिया। बाद में भगीरथ की तपस्या से गंगा पृथ्वी पर आईं।  गंगा का केवल धार्मिक ही नहीं, वैज्ञानिक दृष्टि से भी विशेष महत्व है। शोधों के अनुसार, गंगाजल में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं, जिससे यह कई वर्षों तक शुद्ध रहता है।  हरिद्वार और प्रयागराज में कुंभ मेले का आयोजन गंगा के महत्व को और भी बढ़ाता है, क्योंकि मान्यता है कि समुद्र मंथन से निकले अमृत की बूंदें गंगा में गिरी थीं।  

 प्राचीन काल से ही गंगा को माता के रूप में पूजनीय माना गया है। ऋग्वेद से लेकर महाभारत, रामायण और पुराणों तक, हर ग्रंथ में गंगा का विशेष उल्लेख मिलता है। यह केवल पवित्रता और मोक्ष प्रदान करने वाली नदी नहीं, बल्कि जीवनदायिनी भी है।  महाभारत में गंगा का एक और महत्वपूर्ण संदर्भ मिलता है। वहाँ गंगा महाराज शांतनु की पत्नी के रूप में प्रकट होती हैं और भीष्म पितामह उनकी संतान होते हैं। इस कथा में गंगा को केवल पवित्र नदी नहीं, बल्कि एक सजीव देवी के रूप में दर्शाया गया है, जिनका स्थान देवताओं के समान ऊँचा है।  

गंगा केवल धार्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी इसका विशेष महत्व है। गंगा का जल वर्षों तक रखने पर भी खराब नहीं होता, जबकि अन्य नदियों का पानी कुछ ही दिनों में खराब होने लगता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि गंगा के जल में एक विशेष प्रकार के बैक्टीरियोफेज (बैक्टीरिया खाने वाले वायरस) होते हैं, जो इसमें बैक्टीरिया को पनपने नहीं देते। इस कारण गंगा का जल प्राकृतिक रूप से शुद्ध और रोग प्रतिरोधक क्षमता से भरपूर रहता है।  इसके अतिरिक्त, गंगा भारत की कृषि, जलापूर्ति और जलविद्युत परियोजनाओं का आधार है। उत्तराखंड से निकलकर यह नदी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल होते हुए बंगाल की खाड़ी में समाहित हो जाती है। इसके किनारे बसे लाखों लोग गंगा पर अपनी जीविका निर्भर करते हैं।  

हालांकि गंगा का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व अद्वितीय है, फिर भी वर्तमान में यह नदी प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रही है। औद्योगिक कचरा, अपशिष्ट पदार्थ और अनियंत्रित नगरीय विकास के कारण गंगा का जल धीरे-धीरे अशुद्ध हो रहा है। भारतीय सरकार ने इसे स्वच्छ बनाने के लिए "नमामि गंगे" जैसी कई परियोजनाएँ शुरू की हैं, लेकिन आम जनता की जागरूकता और भागीदारी के बिना यह संभव नहीं होगा।  

गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक धरोहर है। इसका जल अमृत तुल्य माना जाता है, और इसके संरक्षण की दिशा में निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। गंगा के बिना भारत की कल्पना भी अधूरी है, और इसके अस्तित्व को बनाए रखना हमारा कर्तव्य है।

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