विनोद कुमार झा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चुनाव सुधारों को लेकर भारत और ब्राजील का उदाहरण देना वैश्विक राजनीति में एक दिलचस्प मोड़ है। उन्होंने स्वीकार किया कि अमेरिका, जो लोकतंत्र का प्रतीक माना जाता है, अब भी चुनावी प्रक्रियाओं को सुरक्षित और पारदर्शी बनाने में अन्य देशों से पीछे है। यह स्वीकारोक्ति न केवल अमेरिका की चुनावी प्रणाली की कमियों को उजागर करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि लोकतंत्र के मजबूत स्तंभों को समय के साथ मजबूत बनाए रखना आवश्यक है। राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत और ब्राजील की चर्चा करते हुए कहा कि ये देश मतदाता पहचान प्रणाली को बायोमेट्रिक डाटाबेस से जोड़ने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। भारत में आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र को जोड़ने की प्रक्रिया पर विचार किया जा रहा है, जिससे मतदाता की पहचान पुख्ता की जा सके। वहीं, ब्राजील भी इसी तरह की प्रणाली लागू करने की दिशा में काम कर रहा है। इसकी तुलना में, अमेरिका में नागरिकता सत्यापन की प्रक्रिया अपेक्षाकृत कमजोर है और कई मामलों में यह स्वघोषणा पर आधारित होती है, जिससे चुनावी अनियमितताओं की गुंजाइश बढ़ जाती है। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब वे 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में हार के बाद से ही चुनावी अनियमितताओं का मुद्दा उठाते रहे हैं। वे लगातार यह दावा करते रहे हैं कि मेल-इन बैलट प्रणाली में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां हुईं, जिससे उनकी हार हुई। हालांकि, इस दावे का कोई ठोस प्रमाण अब तक नहीं मिला है, लेकिन इसने अमेरिकी चुनाव प्रणाली की विश्वसनीयता पर बहस को तेज कर दिया है।
दूसरी ओर, कई यूरोपीय देश जैसे जर्मनी और कनाडा पारंपरिक पेपर बैलट प्रणाली का पालन करते हैं, जहां मतगणना पूरी पारदर्शिता के साथ आम जनता की मौजूदगी में होती है। इस वजह से वहां चुनाव परिणामों पर विवाद कम होते हैं। इसी तरह, डेनमार्क और स्वीडन में भी चुनावों को लेकर कड़े नियम लागू हैं, जिनमें मेल-इन बैलट की सख्त व्यवस्था शामिल है। इसके विपरीत, अमेरिका में बिना उचित डाक चिन्ह के भी मत पत्र स्वीकार किए जाते हैं, जिससे विवाद की गुंजाइश बढ़ जाती है। अमेरिका लंबे समय से खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र मानता आया है, लेकिन अब उसकी चुनावी प्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे हैं। ट्रंप का यह बयान इस बात की पुष्टि करता है कि अमेरिका को भी अपनी चुनाव प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है। मतदाता पहचान सत्यापन को मजबूत बनाना, मेल-इन बैलट की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना और चुनावी विवादों को कम करने के लिए पेपर बैलट प्रणाली पर विचार करना, कुछ ऐसे कदम हो सकते हैं जिन पर अमेरिका को ध्यान देने की जरूरत है।
डोनाल्ड ट्रंप का भारत और ब्राजील का उदाहरण देना यह दर्शाता है कि अब अमेरिका भी चुनाव सुधारों की आवश्यकता को महसूस कर रहा है। पारदर्शी और निष्पक्ष चुनाव किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ होते हैं और अगर अमेरिका को अपने लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखना है, तो उसे आधुनिक तकनीकों और सख्त चुनावी मानकों को अपनाना ही होगा। भारत, ब्राजील, जर्मनी और कनाडा जैसे देशों से सीख लेते हुए, अमेरिका को अपनी चुनाव प्रणाली में जरूरी बदलाव करने चाहिए ताकि भविष्य में चुनावी प्रक्रियाओं पर किसी भी प्रकार का संदेह न रह सके।