Navratri special 2025: नवरात्रि में माँ दुर्गा के नौ रूपों की कथा एवं भोग

 विनोद कुमार झा


नवरात्रि का पर्व माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना का विशेष समय होता है। प्रत्येक दिन देवी के एक स्वरूप की पूजा की जाती है और उन्हें विशेष भोग अर्पित किया जाता है। यह भोग माँ को प्रसन्न करता है और भक्तों को सुख, समृद्धि एवं शक्ति प्रदान करता है। यहाँ माँ दुर्गा के नौ रूपों की कथा और उनके प्रिय भोग का वर्णन किया गया है।  

1. माँ शैलपुत्री (पहला दिन

कथा: माँ शैलपुत्री हिमालयराज की पुत्री थीं। पिछले जन्म में ये दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं और इनका नाम सती था। सती ने जब अपने पिता द्वारा भगवान शिव का अपमान सहन नहीं किया, तो उन्होंने योग शक्ति से स्वयं को भस्म कर लिया। अगले जन्म में उन्होंने शैलराज हिमालय के घर जन्म लिया और शैलपुत्री कहलाईं। इनका वाहन वृषभ (बैल) है और ये त्रिशूल एवं कमल धारण करती हैं।  

भोग: माँ शैलपुत्री को गाय के घी का भोग अर्पित किया जाता है, जिससे भक्तों को रोगों से मुक्ति और शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है।  

2. माँ ब्रह्मचारिणी (दूसरा दिन)  

कथा: माँ ब्रह्मचारिणी ने घोर तपस्या करके भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया। उन्होंने हजारों वर्षों तक केवल फल-फूल खाकर और फिर कई वर्षों तक निर्जल रहकर तपस्या की। उनकी इस तपस्या से शिव प्रसन्न हुए और उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। माँ ब्रह्मचारिणी के एक हाथ में जप माला और दूसरे में कमंडल होता है, जो तप और संयम का प्रतीक है।  

भोग: माँ ब्रह्मचारिणी को मिश्री, शक्कर और पंचामृत का भोग अर्पित किया जाता है, जिससे भक्तों को दीर्घायु और शक्ति प्राप्त होती है।  

3. माँ चंद्रघंटा (तीसरा दिन) 

 कथा: माँ चंद्रघंटा का स्वरूप अति दिव्य और परम तेजस्वी है। इनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित रहता है, जिससे इन्हें "चंद्रघंटा" कहा जाता है। इनका वाहन सिंह है और इनके दस हाथों में अस्त्र-शस्त्र सुशोभित रहते हैं। जब असुरों का अत्याचार बढ़ा, तब माँ चंद्रघंटा ने अपने रौद्र रूप में उन्हें नष्ट किया।  

भोग: माँ को दूध और उससे बने व्यंजनों का भोग लगाया जाता है, जिससे मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।

4. माँ कूष्मांडा (चौथा दिन)  

कथा: माँ कूष्मांडा ने अपनी अलौकिक शक्ति से सृष्टि की रचना की। जब सृष्टि में अंधकार ही अंधकार था, तब देवी ने मंद स्मित (हल्की मुस्कान) के साथ ब्रह्मांड की रचना की, इसीलिए उन्हें कूष्मांडा कहा जाता है। इनके आठ हाथ होते हैं और ये कमल पर विराजमान रहती हैं।  

भोग:  माँ को मालपुए का भोग लगाया जाता है, जिससे बुद्धि का विकास और निर्णय शक्ति मजबूत होती है।  

5. माँ स्कंदमाता (पाँचवां दिन) 

कथा: माँ स्कंदमाता भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता हैं। जब देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ, तब उन्होंने अपने पुत्र स्कंद को सेनापति बनाया। माँ स्कंदमाता कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं और चार भुजाओं वाली हैं।  

भोग: माँ स्कंदमाता को केले का भोग अर्पित किया जाता है, जिससे भक्तों को सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य प्राप्त होता है।  

6. माँ कात्यायनी (छठा दिन)  

कथा: महर्षि कात्यायन ने माँ भगवती की कठोर तपस्या की, जिससे देवी उनके घर पुत्री रूप में प्रकट हुईं। इसलिए उन्हें कात्यायनी कहा जाता है। इन्होंने महिषासुर का वध करके देवताओं को भयमुक्त किया। माँ कात्यायनी सिंह पर सवार रहती हैं और उनके चार हाथ होते हैं।  

भोग: माँ कात्यायनी को शहद का भोग लगाया जाता है, जिससे भक्तों को सुंदरता और आकर्षण का आशीर्वाद प्राप्त होता है।  

7. माँ कालरात्रि (सातवां दिन)  

कथा: माँ कालरात्रि का स्वरूप अत्यंत भयानक है। इनका शरीर काला, खुले केश, विशाल नेत्र और गर्दन से बिजली की तरह चमकता हुआ आभामंडल निकलता है। जब राक्षसों का अत्याचार बहुत बढ़ गया, तब उन्होंने भयंकर रूप धारण कर उनका संहार किया। 

भोग: माँ कालरात्रि को गुड़ का भोग अर्पित किया जाता है, जिससे भक्तों के जीवन से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।  

8. माँ महागौरी (आठवां दिन)

कथा: माँ महागौरी अष्टवर्षीय कन्या के रूप में पूजी जाती हैं। इन्होंने कठिन तपस्या करके भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया। इनका रंग अत्यंत गौर है, जिसके कारण इन्हें महागौरी कहा जाता है। ये श्वेत वृषभ पर सवार रहती हैं और इनके चार हाथ होते हैं। और सभी पापों का नाश करने वाली देवी बनीं।  

भोग: माँ महागौरी को नारियल का भोग अर्पित किया जाता है, जिससे सुख-शांति और वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है।  

9. माँ सिद्धिदात्री (नवां दिन) 

कथा: माँ सिद्धिदात्री सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करने वाली देवी हैं। भगवान शिव ने भी इनकी कृपा से सिद्धियाँ प्राप्त कीं, जिससे उनका आधा शरीर देवी का हो गया और वे "अर्द्धनारीश्वर" कहलाए। ये कमल पर विराजमान रहती हैं और इनके चार हाथ होते हैं।  

भोग: माँ सिद्धिदात्री को तिल और तिल से बने व्यंजन अर्पित किए जाते हैं, जिससे भक्तों को आध्यात्मिक उन्नति और समृद्धि प्राप्त होती है।  

नवरात्रि में माँ दुर्गा के इन नौ रूपों की पूजा करने से जीवन में सुख, शांति, और शक्ति प्राप्त होती है। इन नौ दिनों में विधिपूर्वक देवी के प्रिय भोग अर्पित करने से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और भक्तों पर माँ की कृपा बनी रहती है।

(जय माता दी)!

Post a Comment

Previous Post Next Post