चैती छठ: आस्था, परंपरा और महापर्व की अद्भुत गाथा

विनोद कुमार झा

चैती छठ केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, पवित्रता और सूर्य उपासना का महापर्व है, जो चार दिनों तक विधिपूर्वक मनाया जाता है। यह पर्व न केवल प्रकृति से जुड़ा हुआ है, बल्कि पारिवारिक सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति का प्रतीक भी है। आइए जानते हैं इसके महत्व, परंपराओं और पूजा विधि के बारे में विस्तार से।

चैती छठ का महत्व और परंपराएं : यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है एक बार चैत्र माह में, जिसे ‘चैती छठ’ कहा जाता है और दूसरी बार कार्तिक माह में, जिसे ‘कार्तिक छठ’ के नाम से जाना जाता है। इस पर्व में व्रतधारी न केवल उगते बल्कि डूबते सूर्य की भी उपासना करते हैं।

चार दिवसीय चैती छठ की पूजा विधि

पहला दिन (नहाय-खाय) : इस दिन व्रती पवित्र स्नान कर नए वस्त्र धारण करते हैं। शुद्ध और सात्विक भोजन जैसे चने की दाल, कद्दू की सब्जी और चावल ग्रहण किया जाता है। घर की साफ-सफाई और शुद्धिकरण पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

दूसरा दिन (खरना) : व्रती पूरे दिन उपवास रखते हैं और शाम को गुड़ की खीर, रोटी और फलाहार ग्रहण करते हैं। यह प्रसाद पूरे समुदाय में वितरित किया जाता है।

तीसरा दिन (संध्या अर्घ्य) : इस दिन व्रती नदी, तालाब या किसी जलाशय के किनारे जाकर डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। बांस की टोकरी में ठेकुआ, फल, गन्ना आदि रखकर विशेष पूजा की जाती है।

चौथा दिन (उगते सूर्य को अर्घ्य) : व्रती उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन करते हैं। इसके बाद प्रसाद वितरण और पारंपरिक गीतों के साथ उत्सव मनाया जाता है।

चैती छठ की पौराणिक कथा

इस महापर्व का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है। कथा के अनुसार, राजा प्रियव्रत और उनकी पत्नी को कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप के सुझाव पर उन्होंने पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया, जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई, लेकिन दुर्भाग्यवश वह मृत पैदा हुआ। राजा जब बालक के अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे थे, तभी आकाश से षष्ठी देवी प्रकट हुईं और अपने दिव्य स्पर्श से बालक को जीवनदान दिया। तभी से इस दिन षष्ठी देवी की पूजा का विधान प्रारंभ हुआ।

सीता माता और छठ पूजा का संबंध

ऐसी मान्यता है कि जब भगवान श्रीराम और माता सीता 14 वर्षों का वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटे, तब उन्होंने रावण वध के दोष निवारण और सुख-समृद्धि हेतु छठ व्रत रखा। ऋषि मुद्गल के आदेशानुसार माता सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को छह दिनों तक सूर्यदेव की पूजा की और सातवें दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर अनुष्ठान पूर्ण किया।

छठ पूजा के नियम और विशेष सावधानियां

- इस व्रत के दौरान घर और पूजा स्थल की शुद्धता बनाए रखना अनिवार्य है।

- व्रतधारी को सात्विक आहार ही ग्रहण करना चाहिए और प्याज-लहसुन का सेवन वर्जित होता है।

- प्रसाद को अत्यंत शुद्धता से बनाया जाता है और इसे केवल व्रती के हाथों से तैयार किया जाता है।

चैती छठ केवल उपवास और अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, अध्यात्म और समर्पण का अनुपम संगम है। यह न केवल सूर्य देव की उपासना है, बल्कि समाज में भाईचारे, शुद्धता और पारिवारिक समृद्धि का संदेश भी देता है। इसलिए, छठ पूजा एक दिव्य परंपरा के रूप में युगों-युगों से श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाई जाती रही है।

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