ट्रंप की नई कर नीति दूरगामी सोच

विनोद कुमार झा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित पारस्परिक कर (Reciprocal Tax) नीति वैश्विक व्यापार पर दूरगामी प्रभाव डाल सकती है। यह नीति उन देशों पर लागू होगी जो अमेरिकी उत्पादों पर कर लगाते हैं, और बदले में अमेरिका भी समान दर से कर लगाएगा। भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्ते पहले से ही उतार-चढ़ाव से गुजर रहे हैं। ट्रंप की इस नई कर प्रणाली के तहत अब भारत से अमेरिका में निर्यात होने वाले उत्पादों पर वही कर लगेगा, जो भारत अमेरिकी वस्तुओं पर लगाता है। यह नीति भारतीय निर्यातकों के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर सकती है, विशेष रूप से आईटी, फार्मा और वस्त्र उद्योगों के लिए। फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ट्रंप की मुलाकात के दौरान भारत ने अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) की पेशकश की थी। हालांकि, अमेरिका द्वारा एकतरफा पारस्परिक कर लागू करने से यह वार्ता जटिल हो सकती है। ट्रंप की नीति से केवल भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापारिक समीकरण भी प्रभावित होंगे। चीन, जापान और दक्षिण कोरिया ने अमेरिका के इस कदम का जवाब देने का निर्णय लिया है। यह स्पष्ट संकेत है कि अमेरिका की नीति के खिलाफ एशियाई देश एकजुट हो रहे हैं। विशेष रूप से चिप निर्माण और सेमीकंडक्टर उद्योग में सहयोग बढ़ाने की इन देशों की प्रतिबद्धता बताती है कि वे अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कम करने के लिए एक साथ काम करेंगे। यदि अन्य देश भी इसी तरह के जवाबी कर लगाने लगते हैं, तो व्यापार युद्ध और आर्थिक अस्थिरता बढ़ सकती है। अमेरिका की इस नई नीति से द्विपक्षीय व्यापार वार्ता कठिन हो सकती है और भारत को अपनी निर्यात रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। चीन, जापान और दक्षिण कोरिया के गठजोड़ से अमेरिका के खिलाफ एक नया व्यापारिक ध्रुव उभर सकता है। ट्रंप की पारस्परिक कर नीति वैश्विक व्यापार में एक नए युग की शुरुआत कर सकती है। भारत को इस नीति से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने के लिए अपने निर्यात नीतियों में लचीलापन लाना होगा और अन्य देशों के साथ व्यापारिक साझेदारी को मजबूत करना होगा। साथ ही, अमेरिका को भी यह समझना होगा कि व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को संरक्षणवाद से हल नहीं किया जा सकता, बल्कि निष्पक्ष और संतुलित व्यापार नीतियों की आवश्यकता है।

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