शक्ति, ममता, दया और करुणा की मूर्त स्वरूप है मां दुर्गा

 विनोद कुमार झा

सदियों से चली आ रही नवरात्रि की परंपरा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि एक दिव्य यात्रा है, जिसमें माँ के नौ रूपों की महिमा का गुणगान किया जाता है। यह कथा भक्तों की आस्था, शक्ति और भक्ति का अद्भुत संगम है। माँ की ममता, करुणा, पालन करने की शक्ति और दुष्टों का नाश करने की उनकी अद्वितीय क्षमता उन्हें जगतजननी के रूप में प्रतिष्ठित करती है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, माँ के अनेक रूपों की पूजा आदिकाल से होती आ रही है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे त्रिदेवों की भाँति माँ के भी कई रूप हैं, जो सृष्टि की रचना, पालन और संहार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भक्तों पर कृपा बरसाने वाली और दुष्टों का नाश करने वाली माँ शक्ति के नौ रूप शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री अलौकिक शक्तियों से परिपूर्ण माने जाते हैं। इन रूपों की पूजा कर भक्त अपने जीवन में शक्ति, ज्ञान और समृद्धि की प्राप्ति करते हैं।

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

सती के बलिदान की कथा : एक बार राजा दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने अपने दामाद भगवान शिव का अपमान किया। यह अपमान माता सती से सहन नहीं हुआ और उन्होंने यज्ञ कुंड में स्वयं को समर्पित कर दिया। जब भगवान शिव को इस घटना का पता चला, तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे और माता सती के पार्थिव शरीर को अपने कंधे पर उठाकर पूरे त्रिलोक में तांडव करने लगे। इस प्रलयंकारी स्थिति को देखकर देवता भयभीत हो गए और भगवान विष्णु से इस संकट का समाधान निकालने की प्रार्थना की।

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े कर दिए, जो विभिन्न स्थानों पर गिरे और शक्तिपीठों के रूप में स्थापित हुए। आज भी ये शक्तिपीठ माँ की दिव्य ऊर्जा के प्रतीक माने जाते हैं, और भक्तगण वहाँ जाकर अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण करने के लिए नवरात्रि में विशेष रूप से पूजा-अर्चना करते हैं।

दुर्गा सप्तशती, जिसे देवी महात्म्यम भी कहा जाता है, शक्ति की स्तुति का सबसे पवित्र ग्रंथ है। यह ग्रंथ 700 श्लोकों का संग्रह है, जिसमें देवी के महात्म्य का वर्णन किया गया है। यह तीन भागों में विभाजित है—प्रथम चरित्र (माध्यमिक शक्ति), मध्यम चरित्र (महिषासुर मर्दिनी) और उत्तर चरित्र (महासरस्वती)।

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते॥

समय-समय पर माँ ने पृथ्वी पर अवतार लेकर अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना की। दुर्गा सप्तशती में माँ के अनेक अवतारों और उनकी शक्ति का उल्लेख किया गया है। जब भी राक्षसों का अत्याचार बढ़ा, तब माँ ने किसी न किसी रूप में अवतरित होकर उनका संहार किया। महिषासुर का वध करने के लिए माँ दुर्गा ने अवतार लिया, तो शुंभ-निशुंभ के अंत के लिए माँ कात्यायनी प्रकट हुईं।

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

भारत में अनेक शक्तिपीठ स्थापित हैं, जहाँ भक्त अपनी आस्था के साथ माँ की पूजा करने जाते हैं। इनमें से कामाख्या देवी शक्तिपीठ प्रमुख माना जाता है, जो 56 शक्तिपीठों में से प्रथम शक्तिपीठ है। ऐसा कहा जाता है कि जो भी भक्त नवरात्रि में इन पवित्र स्थलों पर माँ की आराधना करता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।

माँ का आशीर्वाद और भक्तों की श्रद्धा : भक्तजन माँ को अलग-अलग रूपों में पूजते हैं। कोई उन्हें वैष्णवी मानकर उनकी आराधना करता है, तो कोई उन्हें जगदंबा के रूप में पूजता है। शक्ति, ममता, दया और करुणा की मूर्त स्वरूप माँ सदैव अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उन्हें कष्टों से उबारती हैं।

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

नवरात्रि में भक्तजन उपवास रखते हैं और विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। इस दौरान माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। पहले दिन शैलपुत्री की पूजा कर भक्त अपनी भक्ति यात्रा आरंभ करते हैं, और अंतिम दिन सिद्धिदात्री की आराधना कर वे पूर्णता प्राप्त करते हैं। इस दौरान नौ दिनों तक देवी के भजन-कीर्तन किए जाते हैं, और घर-घर में अखंड ज्योति जलाकर माँ की कृपा प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। कन्या पूजन भी इस पर्व का एक महत्वपूर्ण अंग है।

नवरात्रि का समापन  रामनवमी और दशहरे के पर्व के साथ होता है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। इस दिन भगवान राम ने रावण का वध किया था, और इसी उपलक्ष्य में देशभर में रावण दहन किया जाता है। यह हमें सिखाता है कि सत्य और धर्म की राह पर चलने वालों की हमेशा विजय होती है।

नवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है, जो हमें धर्म, भक्ति और शक्ति की महिमा का बोध कराती है। यह नौ दिनों का पर्व हमें माँ की कृपा प्राप्त करने और जीवन में नई ऊर्जा और शक्ति प्राप्त करने का अवसर देता है। जो भी भक्त सच्चे मन से माँ की आराधना करता है, उसके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का संचार होता है।

जय माता दी!

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